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कैलाश मानसरोवर यात्रा: बालेन सरकार की आपत्ति को MEA ने किया खारिज, लिपुलेख दर्रे को बताया था नेपाल का हिस्सा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Rahul Kumar Updated Sun, 03 May 2026 10:04 PM IST
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सार
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नेपाल ने एक बार फिर लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन को कूटनीतिक संदेश भेजा है। नेपाल ने 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए दोहराया कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी उसके क्षेत्र में आते हैं। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने दावे को खारिज कर दिया है।

Nepal objects objection to plans to operate the Kailash Mansarovar pilgrimage route via Lipulekh
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल - फोटो : ANI
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विस्तार

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नेपाल ने भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे से आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की योजना पर रविवार को आपत्ति जताई है। नेपाल का दावा है कि यह इलाका काठमांडू के अधिकार क्षेत्र में आता है। सरकार ने कहा है कि उसने इस संबंध में अपनी स्थिति भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक माध्यमों से अवगत करा दिया है। कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल की यह आपत्ति भारत द्वारा यात्रा के जून और अगस्त के बीच आयोजित होने की घोषणा के कुछ दिनों बाद आई है।

नेपाल के दावे को विदेश मंत्रालय ने किया खारिज 
इस पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ कहा कि इस मामले में भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट और एक जैसा रहा है। उन्होंने बताया कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक रास्ता रहा है और कई दशकों से इसी मार्ग से यात्रा होती आ रही है, इसलिए इसमें कुछ भी नया नहीं है। उन्होंने नेपाल के दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत ऐसे क्षेत्रीय दावों को न तो सही मानता है और न ही ये ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एकतरफा तरीके से सीमा का विस्तार दिखाना स्वीकार्य नहीं है। इसके साथ ही भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह नेपाल के साथ सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है। सीमा से जुड़े लंबित विवादों को भी आपसी संवाद और कूटनीति के जरिए सुलझाने की बात कही गई है।

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क्या है नेपाली विदेश मंत्रालय का बयान?
सरकार की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि विदेश मंत्रालय का ध्यान विभिन्न मीडिया माध्यमों के जरिए उठाए गए उन सवालों की ओर गया है, जो भारत और चीन की भागीदारी से लिपुलेख मार्ग के जरिए प्रस्तावित कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़े हैं। नेपाल सरकार ने कहा है कि वर्ष 1816 की सुगौली संधि के अनुसार महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी उसके अभिन्न हिस्से हैं। लिपुलेख के रास्ते प्रस्तावित इस यात्रा को लेकर नेपाल ने अपनी स्पष्ट स्थिति और चिंताएं भारत और चीन, दोनों को कूटनीतिक माध्यमों से अवगत करा दी हैं।

नेपाल सरकार ने भारत से लगातार यह आग्रह किया है कि संबंधित क्षेत्र में सड़क निर्माण या विस्तार, सीमा व्यापार या तीर्थ मार्ग जैसी कोई भी गतिविधि न की जाए। इसके अलावा नेपाल ने चीन को भी आधिकारिक तौर पर यह जानकारी दी है कि लिपुलेख क्षेत्र उसके क्षेत्राधिकार में आता है। नेपाल और भारत के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना को ध्यान में रखते हुए नेपाल सरकार ने कहा है कि वह ऐतिहासिक संधियों, तथ्यों, नक्शों और साक्ष्यों के आधार पर बातचीत के जरिए सीमा विवाद का समाधान निकालने के लिए प्रतिबद्ध है। 


बता दें कि नेपाल इससे पहले भी लिपुलेख को अपना हिस्सा बताता रहा है। उसने पिछले साल कुछ नक्शे जारी किए थे, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था, जबकि ये तीनों इलाके भारतीय सीमा में आते हैं।

4 जुलाई से शुरू होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा

इस बीच, कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 का कार्यक्रम जारी कर दिया गया है। इस वर्ष भी यात्रा उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथुला दर्रे के रास्ते संचालित होगी। दोनों मार्गों से 10-10 जत्थों में कुल 1000 श्रद्धालु यात्रा करेंगे, जिनमें लिपुलेख मार्ग से 500 यात्री शामिल होंगे। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से संचालित होने वाली इस यात्रा का पहला जत्था 4 जुलाई को दिल्ली से रवाना होगा। यात्रियों को 30 जून से 3 जुलाई के बीच दिल्ली में मेडिकल जांच, दस्तावेज सत्यापन और आवश्यक ब्रीफिंग पूरी करनी होगी। इस वर्ष यात्रा में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी किया गया है। अब अधिकांश यात्रा सड़क मार्ग से होगी। पहले जहां श्रद्धालुओं को 60 किलोमीटर से अधिक पैदल चलना पड़ता था, अब यह दूरी घटकर करीब 38 किलोमीटर रह गई है। कुल यात्रा लगभग 1738 किलोमीटर की होगी, जिसमें अधिकतर दूरी वाहनों से तय की जाएगी।

मानचित्र विवाद 

गौरतलब है कि मई 2020 में नेपाल की केपी ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने कालापानी और लिपुलेख सहित इन क्षेत्रों को अपने आधिकारिक मानचित्र में शामिल कर लिया था। यह कदम भारत द्वारा धारचूला को तिब्बत में कैलाश मानसरोवर तीर्थस्थल तक ले जाने वाले 80 किलोमीटर लंबे मार्ग का उद्घाटन करने के बाद उठाया गया था। नेपाल ने इस सड़क के उद्घाटन को भारत का एकतरफा कार्य बताते हुए विरोध किया था।

विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल को घोषणा की थी कि वार्षिक कैलाश मानसरोवर यात्रा इस वर्ष जून से अगस्त के बीच दो मार्गों - उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रा और सिक्किम में नाथुला दर्रा - से आयोजित की जाएगी। चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित माउंट कैलाश और मानसरोवर झील की तीर्थयात्रा हिंदुओं, जैनों और बौद्धों के लिए धार्मिक महत्व रखती है। भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों के तहत, यह यात्रा लगभग पांच साल के अंतराल के बाद पिछले साल फिर से शुरू हुई थी।

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क्या थी सुगौली संधि?

भारत और नेपाल के बीच सीमा निर्धारण 1816 में अंग्रेजों और गोरखा शासक के बीच हुए सुगौली समझौते के आधार पर हुआ था। इस समझौते के तहत काली नदी को दोनों देशों की सीमा माना गया। काली या महाकाली नदी का उद्गम क्षेत्र हिमालय की घाटियों में स्थित है, जो भारत, नेपाल और चीन की सीमाओं के पास पड़ता है। कालापानी क्षेत्र इसी इलाके में स्थित है और यहीं लिपुलेख दर्रा भी है। इसके उत्तर-पश्चिम में कुछ दूरी पर लिम्पियाधुरा दर्रा स्थित है। सुगौली संधि के अनुसार काली नदी के पश्चिम का क्षेत्र भारत और पूर्व का क्षेत्र नेपाल के हिस्से में माना गया था। हालांकि, काली नदी के वास्तविक उद्गम को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद बना हुआ है। भारत पूर्वी धारा को नदी का उद्गम मानता है, जबकि नेपाल पश्चिमी धारा को इसका स्रोत मानता है। इसी आधार पर दोनों देश कालापानी क्षेत्र पर अपना-अपना दावा करते हैं।

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