डायबिटीज वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती क्रॉनिक बीमारी है। बच्चे-बुजुर्ग सभी इसका शिकार हो रहे हैं। ब्लड शुगर का अक्सर सामान्य से ज्यादा बने रहना शरीर को अंदर ही अंदर खोखला करता जाता है, यही कारण है कि शुगर के मरीजों को आंखों-किडनी, नसों और दिल से संबंधित बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है।
Diabetes Test: क्या HbA1c टेस्ट पर नहीं किया जा सकता आंख बंद करके भरोसा? रिपोर्ट ने उठाए सवाल
HbA1c टेस्ट डायबिटीज की जांच और पिछले 2–3 महीनों की औसत ब्लड शुगर का स्तर जानने के लिए एक विश्वसनीय टेस्ट माना जाता है। पर क्या ये वास्तव में विश्वसनीय है? आइए इस बारे में जान लेते हैं।
HbA1c टेस्ट भरोसेमंद है या नहीं?
HbA1c टेस्ट को लेकर ऐसे सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं क्योंकि द लैंसेट जर्नल में हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में अलर्ट किया गया है कि इसपर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता है। विशेषतौर पर एनीमिया, क्रोनिक किडनी रोग और पोषण की कमी वाले लोगों में इस टेस्ट के परिणाम विश्वसनीय नहीं माने जा सकते हैं। रिपोर्ट में ऐसा क्यों कहा जा रहा है इसे जानने से पहले HbA1c टेस्ट के बारे में जानना जरूरी है।
- HbA1c यानी ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट एक प्रकार के खून की जांच है। ये खून में पिछले 2 से 3 महीनों के दौरान शुगर का स्तर कितना रहा है इसका औसत बताता है।
- जब हमारे खून में शुगर ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो वह धीरे-धीरे हीमोग्लोबिन (खून में ऑक्सीजन ले जाने वाला प्रोटीन) से चिपक जाती है।
- जितनी ज्यादा शुगर चिपकेगी उतनी ही HbA1c की रीडिंग ज्यादा होगी।
- डॉक्टर इसे डायबिटीज की सही पहचान और उसकी गंभीरता समझने के लिए सबसे भरोसेमंद मानते हैं।
- आमतौर पर HbA1c का नॉर्मल स्तर 5.7% से कम होना चाहिए। अगर यह 5.7% से 6.4% के बीच है तो इसे प्री-डायबिटीज कहा जाता है और 6.5% या उससे अधिक आने पर डायबिटीज माना जाता है।
क्या कहती है अध्ययन की रिपोर्ट?
HbA1c टेस्ट को लेकर द लैंसेट की रिपोर्ट कहती है, भारतीय क्लिनिकल प्रैक्टिस में इस टेस्ट को टाइप-2 डायबिटीज का पता लगाने और मॉनिटरिंग के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है। हालांकि एनीमिया, आयरन की कमी, हीमोग्लोबिनोपैथी, क्रोनिक किडनी रोग और पोषण की कमी वाले लोगों में इसके परिणाम को बहुत भरोसेमंद नहीं माना जा सकता है।
- रिव्यू में साउथ एशिया में टाइप-2 डायबिटीज के लिए HbA1c पर लोगों के निर्भर होने पर सवाल उठाए गए हैं।
- विशेषज्ञों ने कहा, एनीमिया, हीमोग्लोबिनोपैथी जैसे कोई भी स्थिति जो हीमोग्लोबिन की मात्रा, इसकी बनावट या हीमोग्लोबिन के लाइफस्पैन को प्रभावित करती है, ये HbA1c की रीडिंग पर भी असर डाल सकती है।
एनीमिया वाले लोगों में गलत आ सकती है रीडिंग
प्रोफेसर अनूप मिश्रा और उनके साथियों की अगुवाई में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि डायबिटीज के लिए HbA1c पर अकेले निर्भर रहना मिसलीडिंग हो सकता है।
- HbA1c उन लोगों में ब्लड ग्लूकोज के स्तर को कम या ज्यादा बता सकता है जिनमें ब्लड काउंट कम (एनीमिया), आनुवांशिक ब्लड डिसऑर्डर जैसी समस्याएं रही हैं।
- भारत के 57% से ज्यादा महिलाएं आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया का शिकार हैं। ऐसे लोगों में इस टेस्ट से डायबिटीज के डायग्नोसिस और मॉनिटरिंग दोनों पर असर पड़ सकता है और उनका इलाज भी प्रभावित हो सकता है।
- जिन पुरुषों में G6PD की कमी का पता नहीं चला है, उनमें सिर्फ HbA1c पर निर्भर रहने से डायबिटीद के डायग्नोसिस में चार साल तक की देरी हो सकती है।
- G6PD की कमी एक आनुवंशिक स्थिति है, जिसमें शरीर में 'ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डीहाइड्रोजनेज' एंजाइम की कमी होती है। यह एंजाइम लाल रक्त कोशिकाओंकी रक्षा करता है। इस कमी के कारण RBCs तेजी से टूटने लगती हैं और शरीर में खून की कमी हो सकती है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा, डायबिटीज के सही निदान के लिए HbA1c टेस्ट के साथ, ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) और फ्रुक्टोसामाइन टेस्ट भी किए जाने चाहिए।
जिन लोगों को आनुवांशिक रूप से शुगर की बीमारी का खतरा रहा है, पर साथ ही एनीमिया जैसी समस्या भी है उन्हें शुगर के अन्य जांच भी कराते रहने चाहिए ताकि ब्लड ग्लूकोज स्तर का सही से अंदाजा लगाया जा सके।
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स्रोत और संदर्भ
HbA1c alone might not reliably indicate India's diabetes prevalence
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