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सियासत: ज्ञानी रघबीर सिंह बुला सकते हैं सरबत खालसा, 2027 चुनाव से पहले पंथक वोट बैंक के पुनर्गठन की संभावनाएं

पंकज शर्मा, अमर उजाला, अमृतसर Published by: शाहरुख खान Updated Sat, 21 Feb 2026 12:10 PM IST
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सार

ज्ञानी रघबीर सिंह की सरबत खालसा की संभावित घोषणा से पंजाब की सियासत में हलचल है। 2027 चुनाव से पहले पंथक वोट बैंक के पुनर्गठन की संभावनाएं तेज हो गई हैं। पंथक वोट बैंक के बिखराव की आशंका, नए मोर्चों के उभरने की संभावनाएं हैं।

Giani Raghbir Singh Call for Sarbat Khalsa Sparks Political Buzz in Punjab News in Hindi
ज्ञानी रघबीर सिंह - फोटो : संवाद
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विस्तार

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी), अकाल तख्त और शिरोमणि अकाली दल को मौजूदा संकट से उबारने के लिए सरबत खालसा बुलाने की मांग ने पंजाब की पंथक और सियासी हलकों में नई हलचल पैदा कर दी है। 
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श्री हरिमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी और अकाल तख्त साहिब के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह ने स्पष्ट कहा है कि पंथक संस्थाओं को एक परिवार के प्रभाव से मुक्त करवाने और सिख कौम को एकजुट करने के लिए सरबत खालसा समय की जरूरत है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि इस दिशा में जल्द ठोस कदम उठाया जा सकता है।
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ज्ञानी रघबीर सिंह के इस बयान ने विशेष रूप से शिरोमणि अकाली दल (बादल) पर दबाव बढ़ा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरबत खालसा बुलाया जाता है तो इसका सबसे सीधा प्रभाव अकाली दल पर पड़ेगा, जो पहले ही अंदरूनी मतभेद और नेतृत्व को लेकर उठते सवालों से जूझ रहा है। 

क्या है सरबत खालसा का महत्व
सरबत खालसा सिख परंपरा में सर्वोच्च सामूहिक निर्णय की संस्था मानी जाती है, जिसमें पंथ से जुड़े अहम धार्मिक और सामुदायिक मुद्दों पर सर्वसम्मति से निर्णय लिए जाते हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब पंथक संकट गहराया, तब-तब सरबत खालसा के मंच से बड़े फैसले सामने आए। पिछले वर्षों में भी जब-जब सरबत खालसा बुलाया गया, उसका सीधा असर पंजाब की राजनीति, विशेषकर अकाली दल की स्थिति पर पड़ा। सबसे पहले वर्ष 1986 में अकाल तख्त साहिब पर सरबत खालाया बुलाया गया था। इस के बाद वर्ष 2015 में गांव चब्बा में सरबत खालसा बुलाया गया था।

 

किस दल पर पड़ेगा असर
विशेषज्ञों के अनुसार सरबत खालसा की घोषणा अकाली दल (बादल) के पारंपरिक पंथक वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है। इससे नेतृत्व परिवर्तन का दबाव बढ़ सकता है या नए पंथक मोर्चे के उदय की संभावना बन सकती है। 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह घटनाक्रम बादल गुट के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

अन्य दलों की बात करें तो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस इसे धार्मिक मामला बताकर दूरी बना सकती हैं, लेकिन पंथक वोटों में संभावित बिखराव का राजनीतिक लाभ उन्हें मिल सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरबत खालसा के निर्णयों की वैधता और व्यापक स्वीकार्यता पर ही उसके प्रभाव की गहराई निर्भर करेगी। फिलहाल, इसकी संभावित घोषणा ने पंजाब की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है।

पंथक राजनीति का भविष्य
पंजाब की राजनीति में पंथक मुद्दे हमेशा अहम रहे हैं। यदि सरबत खालसा बुलाया जाता है और कोई बड़ा धार्मिक या संगठनात्मक फैसला सामने आता है, तो पंथक राजनीति का पुनर्गठन संभव है। इससे अकाली दल में नेतृत्व परिवर्तन का दबाव बढ़ सकता है, नए पंथक मोर्चे उभर सकते हैं या वोट बैंक का स्थायी विभाजन हो सकता है। प्रभाव की गहराई उसकी वैधता और स्वीकार्यता पर निर्भर करेगी।
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